न्यूज प्रिन्ट नई दिल्ली देहरादून। उत्तर भारत इस वक्त एक मूक आपदा से जूझ रहा है। सांस लेना अब स्वाभाविक क्रिया नहीं, बल्कि जोखिम भरा काम बन चुका है। दिसंबर 2025 की ठंड के साथ वायु प्रदूषण ने ऐसा विकराल रूप ले लिया है कि राजधानी दिल्ली से लेकर उत्तराखंड की घाटियों तक हवा जानलेवा स्तर पर पहुंच गई है। एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) कई इलाकों में ‘गंभीर’ श्रेणी को पार कर ‘खतरनाक’ स्थिति में दर्ज किया जा रहा है, जिसे स्वास्थ्य विशेषज्ञ सीधे तौर पर हेल्थ इमरजेंसी मान रहे हैं।
दिल्ली-एनसीआर में AQI लगातार 450 से 600 के बीच बना हुआ है। आनंद विहार, मुंडका जैसे क्षेत्रों में हालात सबसे खराब हैं, जहां स्मॉग की मोटी परत ने दिन में भी रात जैसा अंधेरा पैदा कर दिया है। हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है, जहां AQI 300 से 400 के बीच दर्ज किया गया है। ठंडी हवा, कम दृश्यता और जहरीले कणों ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है।
सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि प्रदूषण अब केवल मैदानी इलाकों तक सीमित नहीं रहा। उत्तराखंड, जिसे अब तक स्वच्छ हवा का भरोसेमंद ठिकाना माना जाता था, वहां भी हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं। देहरादून में AQI 250 से 350 के बीच पहुंच चुका है। दून घाटी की भौगोलिक संरचना के कारण प्रदूषित हवा बाहर नहीं निकल पा रही है। स्मार्ट सिटी परियोजनाओं, तेज़ी से हो रहे निर्माण कार्यों और दिल्ली–देहरादून एक्सप्रेसवे से उड़ती धूल ने शहर की फिजा को जहरीला बना दिया है।
हरिद्वार और उधम सिंह नगर जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में भी स्थिति गंभीर है। उद्योगों से निकलने वाला धुआं और घना कोहरा मिलकर खतरनाक स्मॉग बना रहे हैं। मौसम विभाग ने इन इलाकों में घने कोहरे को लेकर येलो अलर्ट जारी किया है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, हवा में मौजूद PM2.5 के सूक्ष्म कण फेफड़ों के जरिए सीधे रक्त में प्रवेश कर रहे हैं। इससे अस्थमा और सांस के मरीजों की हालत बिगड़ रही है, वहीं स्वस्थ लोगों में भी हार्ट अटैक और ब्रेन स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ गया है। बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह स्थिति सबसे अधिक खतरनाक मानी जा रही है।
हालात की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार के वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण नियंत्रण का सबसे सख्त चरण GRAP-IV लागू कर दिया है। इसके तहत ट्रकों की एंट्री पर रोक, निर्माण कार्यों पर पूर्ण प्रतिबंध, स्कूलों को ऑनलाइन मोड में शिफ्ट करने और दफ्तरों को सीमित क्षमता के साथ संचालित करने के निर्देश दिए गए हैं। उत्तराखंड में भी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने खुले में कूड़ा जलाने पर सख्ती और धूल नियंत्रण के उपाय लागू किए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि हवा की कम गति और गिरते तापमान ने प्रदूषकों को वातावरण में फंसा दिया है, जिससे हालात और बिगड़ रहे हैं। नागरिकों से अपील की गई है कि वे अनावश्यक बाहर न निकलें, सुबह की सैर से बचें और बाहर जाते समय N95 मास्क का अनिवार्य रूप से प्रयोग करें।
उत्तर भारत फिलहाल सिर्फ प्रदूषण नहीं, बल्कि एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के दौर से गुजर रहा है—और यह संकट चेतावनी दे रहा है कि अगर अब भी नहीं चेते, तो इसकी कीमत सांसों से चुकानी पड़ेगी।
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