न्यूज प्रिन्ट,रुद्रपुर। POSH कानून वर्कप्लेस में महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा की न्यूनतम गारंटी है। यह कानून काग़ज़ों में सजाने के लिए नहीं, बल्कि ज़मीन पर लागू करने के लिए बना है। इसके बावजूद उत्तराखंड में बड़ी संख्या में संस्थान POSH कानून की अनदेखी कर रहे हैं, जिसका सीधा असर महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा पर पड़ रहा है। POSH का पूरा नाम है Prevention of Sexual Harassment। भारत में इसे आधिकारिक रूप से Sexual Harassment of Women at Workplace (Prevention, Prohibition and Redressal) Act, 2013 कहा जाता है।
यह कानून कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ किसी भी तरह के यौन उत्पीड़न को रोकने और यदि ऐसी घटना हो जाए तो तुरंत, निष्पक्ष और समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है। यह कानून केवल सरकारी दफ्तरों तक सीमित नहीं है। निजी कार्यालय, मीडिया हाउस और न्यूज़ चैनल, स्कूल-कॉलेज-विश्वविद्यालय, फैक्ट्रियाँ, दुकानें, NGO, यहाँ तक कि फील्ड वर्क, ट्रैवल, इंटरव्यू और शूट लोकेशन भी इसके दायरे में आते हैं। साफ शब्दों में—जहाँ काम है, वहाँ POSH लागू है। इसके बावजूद उत्तराखंड में कई संस्थानों में POSH कानून का पालन या तो नाम मात्र का है या बिल्कुल नहीं है। अनेक जगह Internal Complaints Committee (ICC) का गठन नहीं किया गया है, जबकि कानून के तहत यह अनिवार्य है। ICC में एक महिला अध्यक्ष, कम से कम 50 प्रतिशत महिला सदस्य और एक बाहरी सदस्य (NGO या कानूनी विशेषज्ञ) होना ज़रूरी है। ICC का न होना सीधे-सीधे कानून का उल्लंघन है। यौन उत्पीड़न की परिभाषा भी अक्सर गलत समझी जाती है।
यह केवल “छेड़छाड़” तक सीमित नहीं है। भद्दे कमेंट या जोक्स, घूरना या इशारे करना, अनचाहे मैसेज, कॉल या फोटो भेजना, बिना सहमति के छूना, प्रमोशन या नौकरी के बदले “फेवर” माँगना, या डराने-धमकाने वाला माहौल बनाना—ये सभी POSH कानून के तहत अपराध की श्रेणी में आते हैं। एक लाइन में कहा जाए तो जो भी किसी महिला को असहज करे, वही यौन उत्पीड़न है। कानून यह भी स्पष्ट करता है कि पीड़िता घटना के तीन महीने के भीतर लिखित शिकायत दर्ज कर सकती है, और विशेष परिस्थितियों में समय सीमा बढ़ाई भी जा सकती है। ICC को 90 दिनों के भीतर जांच पूरी करनी होती है। शिकायत के बाद पीड़िता पर दबाव बनाना, बदला लेना या धमकाना एक अलग और गंभीर अपराध है। कानून में सज़ा के प्रावधान भी साफ हैं—दोषी को चेतावनी, सस्पेंशन, नौकरी से बर्खास्तगी, सैलरी कटौती और गंभीर मामलों में आपराधिक मुकदमा व जेल तक हो सकती है। इसके अलावा, जो संस्थान POSH कानून का पालन नहीं करते, उन पर ₹50,000 तक जुर्माना लगाया जा सकता है। बार-बार उल्लंघन की स्थिति में संस्थान का लाइसेंस तक रद्द होने का प्रावधान है। इसके बावजूद ज़मीनी सच्चाई यह है कि कई महिलाएँ शिकायत करने से डरती हैं। नौकरी जाने, ट्रांसफर, बदनामी और मानसिक उत्पीड़न का डर उन्हें चुप रहने पर मजबूर करता है। कई मामलों में “समझौते” का दबाव बनाया जाता है, जो कानून और नैतिकता—दोनों के खिलाफ़ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि POSH कानून को सख़्ती और ईमानदारी से लागू किया जाए, तो कार्यस्थलों पर होने वाले महिला अपराधों में बड़ी कमी लाई जा सकती है। नियमित प्रशिक्षण, जागरूकता कार्यक्रम, स्वतंत्र और सक्रिय ICC, और उल्लंघन पर वास्तविक दंड—ये कदम माहौल बदल सकते हैं। एक कड़वी लेकिन ज़रूरी सच्चाई यह भी है कि POSH कानून महिलाओं के खिलाफ़ नहीं, बल्कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए है। इसके दुरुपयोग की दलील देकर कानून को कमजोर नहीं किया जा सकता। हर कानून का दुरुपयोग संभव है, लेकिन समाधान कानून हटाना नहीं, बल्कि उसे ठीक से लागू करना है।
उत्तराखंड में महिला सुरक्षा को लेकर अगर सच में गंभीरता है, तो POSH कानून को केवल फाइलों से निकालकर ज़मीनी हकीकत बनाना होगा। कानून मौजूद है—अब ज़रूरत है इच्छाशक्ति, निगरानी और सख़्त अमल की। इनबॉक्स डॉ. पूजा शाहीन, जो कि महिला अधिकारों, कार्यस्थल सुरक्षा और लैंगिक न्याय पर लंबे समय से काम कर रही विशेषज्ञ हैं, ने उत्तराखंड के कई शहरों में किए गए फील्ड अध्ययन और साक्षात्कारों का हवाला देते हुए बताया, “हमारे अध्ययन में सामने आया है कि कई संस्थाओं में POSH कानून सिर्फ कागज़ पर लागू किया जा रहा है। ICC (Internal Complaints Committee) का गठन तो होता है, लेकिन वह निष्पक्ष, स्वतंत्र और प्रभावी रूप से काम नहीं कर पाती। शिकायतें समय पर निपटने की बजाय तालमेल और दबाव के कारण ठंडे बस्ते में डाल दी जाती हैं।” डॉ. शाहीन ने आगे कहा, “लड़कियाँ और महिलाएँ अक्सर यह सोचती हैं कि शिकायत दर्ज कराना उनके करियर के लिए जोखिम भरा होगा। यहाँ तक कि प्रबंधन की ओर से यह संदेश भी जाता है कि ‘समझौता’ ही बेहतर विकल्प है। इससे न केवल महिलाओं का मनोबल टूटता है, बल्कि अपराधी और अधिक हिम्मत पाते हैं। जब तक POSH कानून का वास्तविक और कड़े स्तर पर पालन नहीं होगा, तब तक महिलाएँ असुरक्षित ही रहेंगी।”


